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बच्चों के सपनों को उड़ान दें, अपनी इच्छाओं का बोझ नहीं´अच्छी परवरिश बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपना नहीं, बल्कि उनके सपनों को समझना है-- बिमल सर्राफ

 बच्चों के सपनों को उड़ान दें, अपनी इच्छाओं का बोझ नहीं´अच्छी परवरिश बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपना नहीं, बल्कि उनके सपनों को समझना है-- बिमल ...


 बच्चों के सपनों को उड़ान दें, अपनी इच्छाओं का बोझ नहीं´अच्छी परवरिश बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपना नहीं, बल्कि उनके सपनों को समझना है-- बिमल सर्राफ

रक्सौल, पूर्वी चंपारण।

हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में सफल हो, उनसे आगे बढ़े और समाज में अपना नाम बनाए। इसके लिए वे बच्चों की अच्छी शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। माता-पिता का यह प्रेम और त्याग अनमोल है, लेकिन अच्छी परवरिश का अर्थ केवल सुविधाएं देना नहीं, बल्कि बच्चों को समझना और उनकी इच्छाओं का सम्मान करना भी है।


हर बच्चा अलग होता है। किसी की रुचि पढ़ाई में होती है, किसी की खेल में, किसी की कला में तो किसी की संगीत या लेखन में। इसलिए हर बच्चे की प्रतिभा और सफलता का रास्ता भी अलग हो सकता है। समस्या तब शुरू होती है, जब माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाओं और सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने लगते हैं।


उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया जब बच्चे पर यह दबाव बनाया जाता है कि उसे क्या पढ़ना है, क्या बनना है और किस क्षेत्र में आगे बढ़ना है, तो उसकी अपनी पसंद और प्रतिभा पीछे छूटने लगती है। लगातार तुलना, डांट और अपेक्षाओं का बोझ उसके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। कई बार बच्चा अपनी परेशानी परिवार से साझा करना भी बंद कर देता है।

हमें यह समझना होगा कि बच्चे हमारे सपनों को पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि अपने सपनों को जीने के लिए आते हैं।

माता-पिता बच्चों से केवल यह न पूछें कि ‘कितने अंक आए?’ बल्कि यह भी पूछें कि ‘तुम क्या करना चाहते हो?’ और ‘तुम खुश हो?’ कई बार बच्चों को सलाह से अधिक जरूरत होती है कि कोई उनकी बात ध्यान से सुने और उन्हें समझे।

अच्छे अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जीवन की सफलता केवल अंकों से तय नहीं होती। आत्मविश्वास, धैर्य, रचनात्मकता, संवेदनशीलता और सही निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है।

माता-पिता को बच्चों का नियंत्रक नहीं, मार्गदर्शक बनना चाहिए। उन्हें सही और गलत का अंतर समझाएं, रास्ते की कठिनाइयों के बारे में बताएं, लेकिन उनकी मंजिल अपने हाथों से तय न करें।

बच्चों का हाथ पकड़कर उन्हें चलना सिखाइए, लेकिन हमेशा उनके कदमों की दिशा अपने हाथ में मत रखिए। उन्हें अपनी मंजिल चुनने दीजिए और उनके सपनों को उड़ान दीजिए।

क्योंकि सच्ची परवरिश वही है, जिसमें बच्चा हमारे सपनों का प्रतिबिंब बनने के बजाय अपनी पहचान के साथ एक अच्छा, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार इंसान बन सके।

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