$show=home

BREAKING NEWS
Loading latest news...

$show=home

लोड हुँदैछ...

हिन्दी दिवस पर विशेष रक्सौल की सूखती साहित्यिक सरिता चंदेश्वर प्रसाद वर्मा से शुरू हुई साहित्यिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती आलेख :✍️ रजनीश प्रियदर्शी

हिन्दी दिवस पर विशेष रक्सौल की सूखती साहित्यिक सरिता चंदेश्वर प्रसाद वर्मा से शुरू हुई साहित्यिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती आले...


हिन्दी दिवस पर विशेष रक्सौल की सूखती साहित्यिक सरिता चंदेश्वर प्रसाद वर्मा से शुरू हुई साहित्यिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती आलेख :✍️ रजनीश प्रियदर्शी,

रक्सौल। भारत-नेपाल सीमा पर बसे रक्सौल शहर की पहचान केवल एक महत्वपूर्ण सीमाई नगर के रूप में ही नहीं, बल्कि कभी साहित्य, संस्कृति और सजग पत्रकारिता के सशक्त केंद्र के रूप में भी रही है। करीब एक सदी से अधिक पुराने इस शहर ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस धरती ने साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को जन्म दिया तथा बाहर से आए अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों की मेजबानी भी की।

लेकिन विडंबना यह है कि जिस रक्सौल में कभी साहित्य की सरिता अविरल बहती थी, वहां पिछले तीन-चार दशकों में साहित्यिक गतिविधियां लगभग नगण्य हो गई हैं। सोशल मीडिया के विस्तार के दौर में पढ़ने, लिखने और गंभीर साहित्यिक विमर्श की संस्कृति लगातार कमजोर हुई है। नई पीढ़ी अपने शहर की उस गौरवशाली साहित्यिक विरासत से अनजान होती जा रही है, जिसे कभी यहां के साहित्य साधकों ने अपने श्रम, समर्पण और साधना से सींचा था।

साहित्यिक जागरण के अग्रदूत थे चंदेश्वर प्रसाद वर्मा

रक्सौल की साहित्यिक चेतना के इतिहास की चर्चा स्मृतिशेष चंदेश्वर प्रसाद वर्मा के उल्लेख के बिना अधूरी है। 5 जनवरी 1939 को जन्मे वर्मा जी को रक्सौल में साहित्यिक जागरण का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने साहित्य के साथ-साथ सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को भी अपनी कर्मभूमि बनाया।

तुमड़िया टोला निवासी चंदेश्वर प्रसाद वर्मा साठ और सत्तर के दशक में रक्सौल के हिन्दी साहित्य जगत में बड़े अदब से लिए जाते थे। धोती-कुर्ता, पान की गिलौरी और दुबले-पतले शरीर के बावजूद उनके व्यक्तित्व में अद्भुत तेज था। उनकी सादगी केवल जीवन शैली तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति में भी दिखाई देती थी। उनकी भाषा सहज, सरल और प्रभावशाली थी, जिसमें एक अलग तरह का सौंदर्य था।


हिंदी साहित्य परिषद् से शुरू हुआ संगठित साहित्यिक आंदोलन


रक्सौल में साहित्यिक जागरण को संगठित स्वर देने का श्रेय हिंदी साहित्य परिषद् को जाता है। वर्ष 1959 में चंदेश्वर प्रसाद वर्मा के प्रयास से इसकी स्थापना हुई। बाद में 29 जून 1962 को प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. श्यामनंदन किशोर ने परिषद् का विधिवत उद्घाटन किया।


परिषद् के माध्यम से रक्सौल में साहित्यिक गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों और वैचारिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे रक्सौल उत्तर बिहार और भारत-नेपाल सीमाई क्षेत्र की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।


साहित्य से राजनीति तक—राष्ट्रवाद था जीवन का आधार


मुंशी सिंह कॉलेज, मोतिहारी और लंगट सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर में एम.ए. की पढ़ाई के दौरान चंदेश्वर प्रसाद वर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। हिन्दी, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विचारों ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।


शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पश्चिम चंपारण के मझौलिया स्थित मोतीलाल उच्च विद्यालय में शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। वर्ष 1965 में रक्सौल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा स्थापित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना। वर्ष 1967 में उन्होंने जनसंघ के चुनाव चिह्न ‘दीपक’ पर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। वे मात्र चार मतों से पराजित हुए। वर्ष 1972 में उन्होंने पुनः चुनाव लड़ा और इस बार 40 मतों से पराजय का सामना करना पड़ा।


क्षीणकाय शरीर में सबल आत्मा धारण करने वाले वर्मा जी के ओजस्वी और राष्ट्रवादी भाषणों की स्मृतियां आज भी अनेक लोगों के जेहन में जीवित हैं। उन्होंने अपने विचारों और सक्रियता से रक्सौल में एक प्रभावशाली जनसंघी वातावरण तैयार किया।


लंबे समय तक अस्वस्थ रहने के कारण उन्हें सक्रिय राजनीति से विराम लेना पड़ा। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता को अपनी कर्मभूमि बनाया। आर्यावर्त हिन्दी दैनिक में उपसंपादक के रूप में सेवाएं देने के साथ-साथ रक्सौल से प्रकाशित ‘मर्यादित सीमा’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए राजनीतिक एवं सामाजिक विषयों पर लेखन किया।


‘अनल-कण’ ने रक्सौल को दी साहित्यिक पहचान


जनवरी 1972 में चंदेश्वर प्रसाद वर्मा के संपादन में ‘अनल-कण’ नामक शुद्ध साहित्यिक त्रैमासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। सीमित संसाधनों के बावजूद इस पत्रिका ने अपने उत्कृष्ट साहित्यिक स्तर से पाठकों और साहित्यप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया।


‘अनल-कण’ रक्सौल के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण थी कि इसके माध्यम से स्थानीय नवोदित और स्थापित रचनाकारों के साथ हिन्दी जगत के मूर्धन्य साहित्यकारों को भी एक मंच मिला। पत्रिका ने अल्प समय में साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।


वर्ष 1972, 1973 और 1975 में इसके अंक प्रकाशित हुए। लेकिन वर्मा जी के खराब स्वास्थ्य और आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण इसका प्रकाशन आगे जारी नहीं रह सका।


एक साहित्य साधक का यह प्रयास आज रक्सौल की साहित्यिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।


पत्र-पत्रिकाओं से गूंजता था रक्सौल का साहित्यिक संसार


एक समय रक्सौल से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाओं की लंबी श्रृंखला इस बात का प्रमाण थी कि यहां साहित्य और पत्रकारिता की जमीन कितनी उर्वर थी।


चंपारण टाइम्स, अरुणिमा, नीलिमा, सांस्कृतिक सेतु, मर्यादित सीमा, रक्सौल टाइम्स, सरहद संवाद, चंपारण संदेश, अनल-कण, सीमांत, अचानक, साहित्यकेतु, दर्पण, साहित्य-मंथन, चंपारण्य, तरंग, सीमांचल, सागरमाथा, रक्सौल चेतना, नारायणी धारा, चंपारण प्रभात, सरहद, ईंख परिवार, चंपारण दर्पण, बज्जिकांचल, रक्सौल टुडे, पड़ोसी, उत्तरधारा, सवेरा, बूंद-बूंद सागर, अवंतिका, किशोर वाणी, शिवा, मितवा और संकल्प जैसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन रक्सौल की साहित्यिक सक्रियता की कहानी स्वयं कहता है।


इन पत्र-पत्रिकाओं के संपादन और प्रकाशन से जुड़े लोगों में श्रीनिवास मस्करा, चंदेश्वर प्रसाद वर्मा, कन्हैया प्रसाद शिक्षक, नंदलाल प्रसाद, गगनदेव प्रसाद सिंह, उमाशंकर अनुज, अर्जुन भारतीय, डॉ. पृथ्वीचंद प्रसाद, रामेश्वर तिवारी, विजयप्रकाश पांडेय, मदनमोहन मनीष, महेंद्र सिंह, डॉ. हरेंद्र हिमकर, सत्येंद्र कुमार सरस, जीवन मस्करा, डॉ. विजय कुमार पांडेय, राजीव पांडेय, योगेंद्र मिश्र, सिंहासन गिरि, शिवेंद्र कुमार सिंह, जय कुमार अजय, म. इब्राहिम, कृष्णमोहन, भरत प्रसाद, मुकुंद शर्मा नेपाली, यादवनंदन प्रसाद और रमाकांत झा सहित अनेक साहित्यप्रेमियों और पत्रकारों का उल्लेख किया जाता है।


इन्हीं प्रयासों के बीच अनेक नई प्रतिभाओं को अपनी रचनात्मक पहचान बनाने का अवसर मिला। रक्सौल के इतिहास और साहित्य पर आधारित पुस्तकों तथा विभिन्न संस्थाओं की स्मारिकाओं का प्रकाशन भी इसी समृद्ध परंपरा का हिस्सा रहा।

रक्सौल की धरती पर पहुंचे थे साहित्य के अनेक दिग्गज

रक्सौल की साहित्यिक प्रतिष्ठा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां देश के अनेक ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों और कवियों का पदार्पण हुआ।

पं. राहुल सांकृत्यायन, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, पं. हंस कुमार तिवारी, आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा, वेणीमाधव मिश्र, पं. रामदयाल पांडेय, डॉ. श्यामनंदन किशोर, श्यामनारायण पांडेय, डॉ. लक्ष्मीनारायण सुधांशु, डॉ. शंभूनाथ सिंह, कन्हैयालाल नंदन, राजेंद्र अवस्थी, डॉ. इंदुशेखर, नजीर बनारसी, काका हाथरसी, आरसी प्रसाद सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, डॉ. शांति सुमन, विंध्याचल प्रसाद गुप्त, सरयू सिंह सुंदर, रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त’, बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, गिरिराज किशोर, शंकरदयाल सिंह, पं. देवकुमार मिश्र, इला डालमिया, डॉ. जगदीश विकल और डॉ. चंद्रभूषण तिवारी जैसे साहित्यिक व्यक्तित्वों का रक्सौल से जुड़ाव इसकी गौरवशाली साहित्यिक परंपरा का प्रमाण है।

स्वस्थ साहित्यिक परंपरा के सामने आज बड़ी चुनौती है। 

समय बदला। तकनीक बदली। संचार के माध्यम बदले। लेकिन साहित्य के प्रति समाज की गंभीरता में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी।

पिछले दो दशकों में शहर में आयोजित अनेक कार्यक्रमों में कवि सम्मेलन के नाम पर गंभीर साहित्य के बजाय हास्य और चुटकुले को प्राथमिकता मिलने लगी। परिणाम यह हुआ कि साहित्यिक संस्कार और वैचारिक विमर्श धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए।

आज रक्सौल की स्वस्थ साहित्यिक परंपरा आधुनिकता के ऐसे दौर में परकटे पंछी की तरह फड़फड़ा रही है, जिसे अपने आकाश की तलाश है।

यह स्थिति केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है।

वर्मा जी की विरासत को आगे बढ़ा रहे राजेश कुमार वर्मा

चंदेश्वर प्रसाद वर्मा के निधन के बाद उनकी साहित्यिक और पत्रकारिता की विरासत को उनके सुपुत्र राजेश कुमार वर्मा ने आगे बढ़ाया। उन्होंने 1995 में दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत की। वर्ष 1999 से 2020 तक दैनिक हिंदुस्तान से जुड़े रहे और वर्तमान में दैनिक भास्कर के प्रधान संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख और रिपोर्ट प्रकाशित होते रहे हैं। इस तरह वर्मा परिवार की कलम आज भी रक्सौल की सामाजिक, सांस्कृतिक और पत्रकारिता की गतिविधियों को शब्द देती रही है।

स्मृति को सम्मान देने की जरूरत

वर्ष 1994 में चंदेश्वर प्रसाद वर्मा के निधन के बाद रक्सौल की साहित्यिक गतिविधियों में धीरे-धीरे शिथिलता आती गई। उनकी स्मृति में तत्कालीन पश्चिम चंपारण सांसद स्व. डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल के प्रयास से गर्ल्स कॉमन रूम का निर्माण भी कराया गया था, जिसे बाद में हटा दिया गया।


आज रक्सौल के साहित्यप्रेमियों की अपेक्षा है कि स्व. चंदेश्वर प्रसाद वर्मा की स्मृति और सम्मान में शहर में उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए अथवा उनके नाम से कोई स्थायी सरकारी योजना, साहित्यिक केंद्र, पुस्तकालय या सांस्कृतिक संस्थान स्थापित किया जाए।


यह केवल किसी एक साहित्यकार का सम्मान नहीं होगा, बल्कि रक्सौल की उस साहित्यिक परंपरा का सम्मान होगा, जिसने कभी इस सीमाई शहर को अपनी विशिष्ट पहचान दी थी।

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना होगा

रक्सौल में प्रतिभा की कभी कमी नहीं रही। कमी रही तो केवल उसे पहचानने, निखारने और उचित मंच देने की।

पुरानी पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह अपने अनुभव और संसाधनों से नई पीढ़ी को साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता की समृद्ध विरासत से जोड़े। विद्यालयों और महाविद्यालयों में साहित्यिक गोष्ठियां हों, नियमित कवि सम्मेलन और परिचर्चाएं आयोजित हों, स्थानीय साहित्यकारों की पुस्तकों का प्रकाशन हो तथा रक्सौल के साहित्यिक इतिहास को दस्तावेज के रूप में संरक्षित किया जाए।

करीब चार - पाँच दशकों से संजोकर रखी गई रक्सौल से प्रकाशित पुरानी पत्र-पत्रिकाएं इस विरासत का अमूल्य हिस्सा हैं। इन्हें सुरक्षित रखने के साथ-साथ डिजिटल रूप में भी संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि रक्सौल केवल व्यापार और सीमा का शहर नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति की भी समृद्ध भूमि रहा है।


अब जरूरत है एक नए साहित्यिक पुनर्जागरण की। 

रक्सौल की साहित्यिक सरिता सूखने नहीं दी जा सकती।

चंदेश्वर प्रसाद वर्मा जैसे साहित्य साधकों ने जिस दीप को जलाया था, उसे बुझने से बचाना आज की पीढ़ी का दायित्व है। यदि साहित्यप्रेमी, बुद्धिजीवी, पत्रकार, शिक्षाविद्, सामाजिक संस्थाएं और युवा मिलकर सार्थक पहल करें तो रक्सौल में एक बार फिर साहित्यिक चेतना की मशाल प्रज्वलित हो सकती है।


रक्सौल को केवल अपने अतीत पर गर्व करने की जरूरत नहीं है; उसे अपने उस गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर एक नया साहित्यिक भविष्य गढ़ने की जरूरत है।यही चंदेश्वर प्रसाद वर्मा और रक्सौल की समृद्ध साहित्यिक विरासत के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने रक्सौल शहर की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हुए रेखांकित किया कि आने वाली या वर्तमान युवा पीढ़ी को इस वैभवशाली धरोहर को संरक्षित करने के साथ अपनी साहित्यिक रुचि बढ़ाने को दृढ़ संकल्पित होकर आगे आने का आग्रह किया।

COMMENTS

यो समाचार पढेर तपाईंलाई कस्तो अनुभूति भयो ?

× तपाईंले यो समाचार पढ्न छुटाउनुभयो?
सबै पोस्टहरू लोड गरियो कुनै पनि पोस्ट भेटिएन सबै हेर्नुहोस् थप पढ्नुहोस् जवाफ दिनुहोस् जवाफ रद्द गर्नुहोस् मेटाउनुहोस् द्वारा गृहपृष्ठ पृष्ठहरू पोष्टहरू सबै हेर्नुहोस् तपाईंको लागि सिफारिस गरिएको category अभिलेख खोज्नुहोस् सबै पोस्टहरू तपाईंको अनुरोधसँग मिल्दो कुनै पनि पोस्ट फेला परेन। घर फर्कनुहोस् Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers पछ्याउनुहोस् यो प्रिमियम सामग्री लक गरिएको छ। STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content