स्वर्ग कहीं और नहीं, हमारे विचारों और कर्मों में बसता है बिमल सर्राफ
रक्सौल, पूर्वी चंपारण।
जीवन वास्तव में एक खेल है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसके खिलाड़ी बनकर परिस्थितियों का सामना करते हैं या परिस्थितियों के हाथों खिलौना बन जाते हैं। समस्याएं अपने आप में न बड़ी होती हैं, न छोटी। उनका आकार हमारी सोच, धैर्य और उन्हें हल करने की क्षमता तय करती है।
हम अक्सर सुख और स्वर्ग की तलाश बाहर करते हैं, जबकि वास्तविक स्वर्ग हमारे अपने मन में होता है। जीवन में शांति, संतोष, प्रेम और प्रसन्नता है तो साधारण परिस्थितियां भी सुखद लगती हैं। इसके विपरीत मन अशांत हो तो तमाम सुख-सुविधाएं भी जीवन को आनंद नहीं दे सकतीं। इसलिए मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलने की प्रतीक्षा करने से बेहतर है कि हम जीते-जी अपने व्यवहार और कर्मों से स्वर्ग जैसा वातावरण बनाएं।
सच्चा सुख उस जीवन में है, जहां प्रेम हो, सहयोग हो, अपनापन हो और दूसरों के कल्याण की भावना हो। छल-कपट, अहंकार, ईर्ष्या और दूसरों को गिराने की प्रवृत्ति मनुष्य के भीतर ही नरक का निर्माण करती है। वहीं सद्भाव, करुणा, क्षमा, सेवा और परोपकार जीवन को स्वर्ग जैसा बना देते हैं।
मनुष्य को स्वयं को परिस्थितियों का गुलाम नहीं समझना चाहिए। हमारे विचार और कर्म ही हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं। इसलिए अच्छे कर्मों का चयन करना और नकारात्मक प्रवृत्तियों से स्वयं को दूर रखना आवश्यक है।
जीवन में ‘लेने’ से अधिक ‘देने’ की भावना विकसित करने की जरूरत है। लेना स्वार्थ हो सकता है, लेकिन देना परमार्थ है। किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी दुखी को सहारा देना और किसी के जीवन में आशा जगाना ही वास्तविक मानवता है। संग्रह की प्रवृत्ति हमें वस्तुओं से जोड़ती है, जबकि देने की भावना हमें मनुष्यता और ईश्वर से जोड़ती है।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने व्यक्त किया।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य शरीर से जीवित रहते हुए भी भीतर से मृत हो सकता है। जब संवेदनाएं समाप्त हो जाएं, दूसरों के दुख से मन विचलित न हो और जीवन में प्रेम तथा करुणा के लिए कोई स्थान न बचे, तब जीवन का वास्तविक अर्थ खोने लगता है।
इसलिए जीवन को केवल लंबा नहीं, बल्कि सुंदर, सार्थक और आनंदपूर्ण बनाना चाहिए। हमारे विचार, हमारे कर्म, हमारा व्यवहार और दूसरों के प्रति हमारी भावना ही हमारे जीवन का वास्तविक स्वर्ग या नरक बनाती है। जिस दिन मन में शांति, हृदय में प्रेम और कर्मों में परमार्थ आ जाएगा, उसी दिन हमें समझ आएगा कि स्वर्ग किसी दूसरे लोक में नहीं, बल्कि हमारे अपने जीवन में ही मौजूद है।

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