बाहर का विकास नहीं,भीतर का परिष्कार ही सच्ची प्रगति है : बिमल सर्राफ
रक्सौल, पूर्वी चंपारण।
मनुष्य की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसने कितनी भौतिक सुविधाएं जुटा लीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि उसने अपने भीतर कितना परिष्कार पैदा किया है। परिष्कार की यही प्रवृत्ति सामाजिक जीवन में सभ्यता और व्यक्ति के आंतरिक जीवन में संस्कृति का रूप लेती है।
शिल्पी, कलाकार, चिकित्सक, शिक्षक, वैज्ञानिक, किसान और माली जैसे लोग अपने श्रम, कौशल और मनोयोग से अनगढ़ को सुगढ़ बनाने का काम करते हैं। वास्तव में मानव सभ्यता की पूरी यात्रा इसी परिष्कार की कहानी है।
आज जिस धरती पर हम विकसित समाज का जीवन जी रहे हैं, वह हमेशा ऐसी नहीं थी। मनुष्य ने अपने संकल्प, श्रम और बुद्धि से जंगलों और कठिन भूभागों को रहने योग्य बनाया, रास्ते बनाए, कृषि और पशुपालन को विकसित किया, औजार और वाहन बनाए तथा अग्नि का उपयोग सीखा। धीरे-धीरे शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार, शासन, सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था के आधार खड़े हुए। यह सब मनुष्य की सृजनशीलता और परिष्कार की प्रवृत्ति का परिणाम है।
भौतिक विज्ञान ने बाहरी संसार को समझने और उसे सुविधाजनक बनाने में अद्भुत प्रगति की है। विज्ञान ने जीवन को गति, सुविधा और अनेक नए अवसर दिए हैं। इसलिए भौतिक विकास का महत्व नकारा नहीं जा सकता। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या बाहरी विकास के साथ मनुष्य का आंतरिक विकास भी उसी गति से हुआ है?
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण चिंतन शुरू होता है।
हमने प्रकृति को जीतने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन अपने मन को जीतने की कोशिश कितनी की? हमने मशीनों को अधिक शक्तिशाली बनाया, लेकिन अपने विवेक को कितना मजबूत किया? हमने ज्ञान के साधन बढ़ाए, लेकिन उस ज्ञान के सदुपयोग की जिम्मेदारी कितनी विकसित की?
आत्म-चेतना, संवेदना, संयम, करुणा, विवेक और उत्तरदायित्व का विकास ही वास्तविक आत्म-परिष्कार है। यदि मनुष्य के भीतर ये गुण विकसित नहीं होते तो बाहरी उपलब्धियां भी कभी-कभी विनाश का कारण बन सकती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रगति की परिभाषा केवल धन, तकनीक, सुविधा और भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न रहे। वास्तविक प्रगति तब होगी, जब मनुष्य का बाहरी जीवन जितना समृद्ध होगा, उसका आंतरिक जीवन भी उतना ही परिष्कृत होगा।
भौतिक विज्ञान ने हमें शक्ति दी है, अब आत्म-विज्ञान और संस्कारों को उस शक्ति को सही दिशा देने का विवेक देना होगा। शक्ति के साथ जिम्मेदारी और अधिकार के साथ कर्तव्य की भावना विकसित करना ही संतुलित सभ्यता की पहचान है।
उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
मनुष्य के हाथ में जब ज्ञान और शक्ति दोनों हों, तब उसके भीतर विवेक का होना अनिवार्य है। अन्यथा साधन विकास के बजाय विनाश का कारण भी बन सकते हैं।
इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य ने कितना विकास किया, बल्कि यह है कि उस विकास के साथ मनुष्य स्वयं कितना बेहतर बना।
सभ्यता का वास्तविक उत्कर्ष केवल बाहर की दुनिया को सुंदर बनाने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के संसार को भी सुंदर बनाने में है। यही परिष्कार मानव गरिमा, संस्कृति और सच्ची प्रगति का सार है।
अंततः सभ्यता का अर्थ केवल बाहरी विकास नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर का परिष्कार है। विज्ञान हमें शक्ति देता है, संस्कृति उस शक्ति को सही दिशा। इसलिए सच्ची प्रगति वही है, जिसमें साधनों के साथ संवेदना, ज्ञान के साथ विवेक और समृद्धि के साथ संस्कार भी बढ़ें।
दुनिया को बदलना विकास है, लेकिन स्वयं को बेहतर बनाना ही सच्ची सभ्यता है।




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